Wednesday, February 22, 2017

क्या आप जानते है महाशिवरात्रि का ये महत्व भी?

जानें क्या है महाशिवरात्रि का रहस्य
‘शिव की महान रात्रि :- महाशिवरात्रि का त्यौहार भारत के आध्यात्मिक उत्सवों की सूची में सबसे महत्वपूर्ण है। भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति में शिव को सबसे बड़ा स्थान दिया गया है। इसके आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कई पहलु सामने आते हैं इसलिए शिवरात्रि का त्यौहार भारत में बहुत प्रसिद्ध है शिव के बारे में अनन्य कथाएं सुनने को मिलती है सबकी अपनी महिमा है।  मैं यंहा आपको आस्था के पक्ष में नहीं ले जाना चाहता उसमें हर किसी का अपना तर्क वितर्क हो सकता है। मैं इस लेख के माध्यम से शिव के सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पक्ष को आप लोगों के सामने रखने का प्रयास करूंगा। शिव को किसी रूप में बांधा नही जा सकता क्योंकि वो निराकार हैं इसलिए शिव के रूप से ज्यादा उनके गुणों से साक्षात्कार करना परम आवश्यक है। सर्वप्रथम "महाशिवरात्रि" के अर्थ को समझने का प्रयत्न करते हैं।
महाशिवरात्रि:-
हर चंद्र माह के चौदहवें दिन या अमावस्या से एक दिन पहले शिवरात्रि होती है। एक कैलेंडर वर्ष में आने वाली बारह शिवरात्रियों में से फरवरी-मार्च में आने वाली महाशिवरात्रि आध्यात्मिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण है। इस रात धरती के उत्तरी गोलार्ध की स्थिति ऐसी होती है कि इंसान के शरीर में ऊर्जा कुदरती रूप से ऊपर की ओर बढ़ती है। इस दिन प्रकृति इंसान को अपने आध्यात्मिक चरम पर पहुंचने के लिए प्रेरित करती है। इसका लाभ उठाने के लिए इस परंपरा में हमने एक खास त्यौहार बनाया जो रात भर चलता है। ऊर्जा के इस प्राकृतिक चढ़ाव में मदद करने के लिए रात भर चलने वाले इस त्यौहार का एक मूलभूत तत्व यह पक्का करना है कि आप रीढ़ को सीधा रखते हुए रात भर जागें। इसलिए योगी रात रात भर जागरण करते हैं और इस ऊर्जा को अपने अंदर निहित करते हैं। योगियों से लेकर गृहस्थ जीवन तक शिवरात्रि को महत्वपूर्ण मानते हैं। शिव को आदि गुरु योगीनाथ के रूप में भी जाना जाता है ऐसा माना जाता है कि आज जिस योगिक क्रिया को जाना जाता है उसकी शुरुवात भगवान शिव से ही हुई थी। इसलिए शिवरात्रि को योगियों में इसलिये भी प्रसिद्ध माना जाता है रात भर जाग कर शिव का गुणगान करते हुए कई योगिक क्रियाएं होती है।
संस्कृति में स्थान:-

हिमाचल में शिव का गुणगान करने का भी अपना एक अलग ही तरीका है हिमाचल के लोगों का प्राचीन धर्म शैव था जो की भगवान् शिव के नाम पर था। यंहा के गद्दी समुदाय में शिव भक्ति को बहुत उच्च स्थान दिया गया है यंहा पर शिव के लिए रात भर जागरण चलता है जिसे "नूआला" कहा जाता है। ये शिव की भक्ति का सबसे अनोखा और अद्वितीय ढंग है ऐसी भक्ति की कला हिमाचल के अलावा अन्य कंही देखने को नहीं मिलती। शिवरात्रि के दिन भी हिमाचल के विभिन्न हिस्सों में " नुआले " गाए जाते हैं। नुआले करने के पीछे आध्यत्मिक और सांस्कृतिक दोनों ही पक्ष सामने आते हैं। नुआले में सांस्कृतिक पक्ष ये है कि इससे लोक गाथाओं और कलाओं को बढ़ावा मिलता है। नुआले में 4 से 5 लोगो का समूह होता है जो अपने पारम्परिक वाद्य यंत्रों से तथा शिव की महिमा को गाकर लोगो को धर्म और संस्कृति का ज्ञान देते हैं।  हिमाचल में शिवरात्रि के दिन विवाह करना बहुत शुभ माना जाता है यंहा गद्दी समुदाय के लोगो के विवाह में शिव आराधना की जाती है तथा शिव के वेश भूषा धारण करके ही विवाह की रस्मे अदा की जाती हैं।

अध्यात्म और योग का परिचायक:-
आध्यात्मिक और गृहस्थ जीवन वालो के लिए शिवरात्रि को शिव के विवाह की रात मानते हुए अपनी महत्वकांक्षाओ की पूर्ति हेतु ब्रत धारण करके शिव की आराधना करते हैं। योगी इसे शिव के स्थिर रूप की उतपति मानते हुए कैलाश के समान स्थिर अचल होकर संसार के प्रथम गुरु आदिगुरु की भक्ति करते हैं। हर वर्ग के बीच शिवरात्रि के अपने अपने पक्ष सामने आते हैं। विज्ञानं में किसी उतपति को स्वीकार नहीं किया जाता इसलिए वैज्ञानिक पक्ष की भी पूर्ति करता है शिवरात्रि का त्यौहार। शिव तो अस्तित्वहीन है ये तो साक्षात् एक शून्य है जो न तो शुरू होता है न ही समाप्त।
शिव के रूपों से प्रेरणा:-

* शिव के स्वभाव से हमें जीवन यापन की प्रेरणा मिलती है। यदि शिवरात्रि के अर्थ को सही ढंग से समझना है तो हमे शिव के रूप को उनके स्वभाव को समझना होगा शिव के हर रूप से जो प्रेरणा मिलती है उसे अपने जीवन में उतारना होगा। शिव के शाब्दिक अर्थ के अनुसार कि " जो नहीं है" अर्थात जो संसार में आपका है ही नहीं जिसका कोई आकार नहीं अर्थात सब कुछ शून्य है। विज्ञानं के अनुसार शून्य से पैदा हुआ और शून्य में निहित होना। शिव का ये निराकारी रूप समस्त प्राणियों को प्रेरणा देता है कि भोग विलासिता से दूर रहो सादा जीवन व्यतीत करो। फ़क़ीर की तरह जियो ताकि संसार की भौतिक वस्तुएं कभी आपको दुःख न पँहुचा सकें।
* शिव आदि कैलाश पति के रूप में सन्देश देते है विकट परिस्थिति में भी पहाड़ की तरह खड़े रहो। मुश्किल परिथिति में भी जीवन यापन किया जा सकता है। इसलिए शिव को ही लोक गाथाओं में इस अलौकिक संसार का गुरु बताया गया है।


*शिव का नीलकंठ रूप सन्देश देता है अच्छाई की बृद्धि के लिए यदि बुराई को धारण करना पड़े सहर्ष धारण करने के लिए तैयार रहें,  बलिदान देने के लिए प्रेरित करता है शिव का नीलकंठ रूप जब समुद्र मंथन में विष प्राप्त हुआ तो शिव ने संसार की रक्षा हेतु उसे अपने कंठ में धारण कर लिया शिव का ये रूप हमे संसार के लिए कुछ करने की प्रेरणा देता है। शिव को सभी जीव जंतुओं का भी देवता माना जाता है ऐसी धारणा है कि संसार के समस्त जीव शिव की झोली में रहते हैं।
*भूतनाथ:-
शिव सांपो को गले में धारण करते है। भूतप्रेत यानि बुरी ताकतों की भी वश में रखते हैं। शिव का ये रूप सन्देश देता है कि सभी प्राणियों से प्रेम करो किसी के साथ घृणा मत करो। सभी मिलजुल कर जीवन यापन कर सकते हैं।
*शिव को भोला भंडारी भी कहा जाता जाता है और रूद्र भी,  शिव का ये रूप सन्देश देता है कि हमे स्वभाव में हमेशा भोले और दयालु रहना चाहिए ताकि सबके हृदय में वास कर सकें और रूद्र रूप से सन्देश मिलता है कि जब जब धर्म की हानि हो पाप बढ़े तब अपने कर्तव्यों से विमुख हुए बिना अन्याय के सामने रौद्र रूप में खड़े होने के लिए तत्पर रहो।  शिव के अनेकों रूप और अनेको नाम है हर नाम में कोई न कोई शिक्षा छिपी है।
इस शिवरात्रि हम सब ये प्रण ले कि शिवरात्रि को मात्र एक त्यौहार या ब्रत के नजरिये से न देखे बल्कि आज समाज में मूल्यों के ह्रास के कारण जो समाज के पतन हो रहा है उसमें शिव के दर्शन को और शिक्षाओं को अपनाएं ताकि समाज की दिशा और दशा दोनों में परिवर्तन हो।
आशीष बहल
चुवाड़ी जिला चम्बा हि प्र

Saturday, February 18, 2017

patriotic Poems by Ashish Behal

देशभक्ति की कविताएं

शहीदों को सलाम
आतंक का देखो कैसा ये कोहराम मचा है,कभी पठानकोट तो कभी उड़ी की साजिश को रचा है।
कई शहिदों ने शहादत का जाम पिया
शहीद जगदीश ने भी ऊँचा भारत का नाम किया,
शहीद हुए देश की खातिर,सीने पर गोली खाई थी,
आओ झुक कर करें सलाम इन्हें क्योंकि भारत माँ की लाज बचाई थी ।
लुट गयी माँ औ की कोख,कंही सिन्दूर ही उजड़ गया
गिली थी हाथो की मेंहदी अभी, कंही बजी अभी शहनाई थी, शहीदों ने भारत माँ की लाज बचाई थी ।
भय नहीं हमे पाक के नापाक इरादों का,
डर है तो घर में बैठे जयचन्दों की बेवफाई का।
बहुत हुआ अब आतंक का तांडव,कुछ नया इतिहास रचना होगा,
जाग देश के नोजवान अब लाहोर में तिरंगा फहराना होगा।
कर सर्जिकल स्ट्राइक चूहों को घर में ही दफनाना होगा,
चीर के सीना सिंधु का इस्लामाबाद को हिंदुस्तान बनाना होगा,
शहीदों की शहादत को तब सलाम हमारा होगा,
कराची में बैठा जब हिंदुस्तान का नवाब होगा,
एक और जमीं होगी एक और आसमान होगा बीच में महकता मेरा ये हिंदुस्तान होगा।
आशीष बहल चुवाड़ी जिला चम्बा हि प्र
फोन 9736296410

सैनिक की पुकार

सुनो सैनिक की वीरता सुनाने आया हूँ, दर्द की मैं इक गाथा कहने आया हूँ। लहू से लथपथ एक सैनिक जब भारत माता को पुकारे वो करुणा बतलाने आया हूँ वीर सैनिक कहता है......
माँ, माँ दर्द से बेहाल मैं बेजान सा हुआ जाता हूँ भर ले अपने आँचल में, मैं लड़खड़ा सा जाता हूँ। चीर कर देह मेरी, दुश्मन ने हैवानियत का वो खेल खेला है क्या बताऊँ माँ,
बन हिमालय सरहद पर हर घाव मैंने झेला है, हिमाकत दुश्मन की जो मुझे ललकारा है, मैंने घर में घुस कर उसको मारा है। हे माँ मैंने दिन रात अपने लहू से तुझे संवारा है,
थका नहीं,हारा नहीं हर पल गुणगान माँ भारती का गाया है, कमाए होंगे किसी ने नोट ,वोट। मैंने तो भारत माँ के आगे ही शीश झुकाया है,
ले ले छांव में अपनी, अपने आँचल में मुझको छिपा लेना, टूटती इस देह को अपनी ममता से भर देना, बन सैनिक हर बार मैं कुर्बान माँ तुझ पर हो जाऊं, बस रोते बिलखते माँ- बाप को तू संभाल लेना।
खड़ी जो हो मेरे इंतजार में प्राण प्यारी चुपके से उसके कान में नाम मेरा ले आना। ढूंढती बहन की आँखों में मेरी तस्वीर छोड़ आना। फौलाद से मेरे भाई के कंधों को तुम साहला आना। पूछे जो कोई पता मेरा प्यारा सा तिरंगा लहरा आना।
बस फरियाद सैनिक की हर भारतवासी सुन लेना
माँ के दामन को दागदार न होने देना,
कहता है 'आशीष' वास्ता सैनिक का खुदगर्ज दुनिया में कभी भारत माँ को न बेच देना, खुदगर्ज दुनिया में कभी भारत माँ को न बेच देना।
आशीष बहल चुवाड़ी जिला चम्बा
Jbt अध्यापक
Ph 9736296410

ना'पाक'  पाकिस्तान
पाक की नापाक हरकतें आखिर कब तक संहेंगे, देश दहक रहा है इंतकाम की आग में कब ये समझेंगे।
बहुत हुआ, सरहद पर अब इक दांव हमारा हो, संभल जा ऐ देश के दुश्मन ऐसा न हो कि लाहौर में लहराता तिरंगा प्यारा हो।

क्या मिलेगा तुझे कश्मीर कश्मीर करते जरा पलट कर देख इतिहास ऐसा न हो कि अबकी बार इस्लामावाद भी हमारा हो।
हे पाकिस्तान, सम्भल जा अभी वक्त हम देते हैं वरना याद रख हिसाब हम सूत समेत लेते हैं।
कर ले ऐ दुश्मन सितम्भ तू, तेरी इंतिहा हम देखेंगे, मर मिटेंगे जो जवान देश पर ऐसे शेर भारत में ही मिलेंगे।
वतन की आवरू को हम यूँ मिटटी में न मिलने देंगे,शहीदों के कतरे कतरे का हिसाब हम लेंगे।
इक दिन फैसला उनके और हमारे दरम्याँ होगा न कोई आतंकी न कोई पाकिस्तान होगा, तभी तो बुलन्दी पर अपना हिंदुस्तान होगा, इक और जमीन इक और आसमां होगा बीच में महकता अपना ये हिन्दुस्तां होगा।
आशीष बहल चुवाड़ी

इक दिया शहीदों के नाम जलाते हैं

खुद को वतन पर कुर्बान करते हैं हर दम हँसते और मुस्कुराते वतन के काम आते हैं इसलिए वतन की आवरु,वतन की शान कहलाते हैं ,तिरंगे में लिपटे भी हर दम ख़ुशी का गान गाते हैं आओ इस दिवाली इक दिया उन शहीदों के नाम जलाते हैं।

कट जाये जो सर उनके उफ़ न जो मुह से करते हैं, वतन की सरहद पर वो अपना जीवन अर्पण करते हैं, बन हिमालय रक्षा वो हर दम हिंदुस्तान की करते हैं, वतन की खातिर वो जीते और मरते है, हर पल खड़े सरहद पर दुश्मन का नामों निशान मिटाते हैं, आओ इस दिवाली एक दिया उन वीर योद्धाओं के नाम जलाते हैं।

आशीष बहल



Thursday, February 9, 2017

बहुत कुछ सिखाती है ये कहानी।

चुनोतियों को स्वीकार करो, मंजिल कदम चूमेगी।


वर्तमान परिपेक्ष्य में हम प्रतियोगिता की होड़ में इस कदर उलझे है कि हम ज़िन्दगी का असली मकसद ही भूल गए हैं आखिर हम क्या चाहते है हमे क्या करना है कंहा पंहुचना है? हम इन बातों से कोसो दूर हो गए हैं क्योंकि हमने चुनीतियों को स्वीकार करना बंद कर दिया है। जब भी चुनोतियों की बात आती है या कोई समस्या हमारे सामने उतपन होती है उस समय मूल मंत्र यही है कि या तो उन्हें स्वीकार करो या उनसे भागते रहो। जो स्वीकार करता है वो जीवन में अपनी मंजिल को पाता है और जो भागता है उसकी दौड़ मंजिल की उलटी दिशा में होती है इसलिए मंजिल से कोसों दूर हो जाता है।
एक बहुत ही बढ़िया उदाहरण जापान के लोगो का है
जापान में हमेशा से ही मछलियाँ खाने का
एक ज़रुरी हिस्सा रही हैं । और ये जितनी
ताज़ी होतीं हैँ लोग उसे उतना ही पसंद करते
हैं । लेकिन जापान के तटों के आस-पास
इतनी मछलियाँ नहीं होतीं की उनसे लोगोँ
की डिमांड पूरी की जा सके । नतीजतन
मछुआरों को दूर समुंद्र में जाकर मछलियाँ
पकड़नी पड़ती हैं।जब इस तरह से मछलियाँ
पकड़ने की शुरुआत हुई तो मछुआरों के
सामने एक गंभीर समस्या सामने आई ।

वे जितनी दूर मछली पक़डने जाते उन्हें
लौटने मे उतना ही अधिक समय लगता
और मछलियाँ बाजार तक पहुँचते-पहुँचते
बासी हो जातीँ , ओर फिर कोई उन्हें खरीदना
नहीं चाहता ।इस समस्या से निपटने के लिए
मछुआरों ने अपनी बोट्स पर फ्रीज़र लगवा
लिये । वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें फ्रीजर
में डाल देते ।

इस तरह से वे और भी देर तक मछलियाँ
पकड़ सकते थे और उसे बाजार तक पहुंचा
सकते थे । पर इसमें भी एक समस्या आ
गयी । जापानी फ्रोजेन फ़िश ओर फ्रेश
फिश में आसनी से अंतर कर लेते और
फ्रोजेन मछलियों को खरीदने से कतराते ,
उन्हें तो किसी भी कीमत पर ताज़ी मछलियाँ
ही चाहिए होतीं ।एक बार फिर मछुआरों ने
इस समस्या से निपटने की सोची और
इस बार एक शानदार तरीका निकाला ,
.उन्होंने अपनी बड़ी – बड़ी जहाजों पर
फ़िश टैंक्स बनवा लिए ओर अब वे
मछलियाँ पकड़ते और उन्हें पानी से
भरे टैंकों मे डाल देते ।

टैंक में डालने के बाद कुछ देर तो
मछलियाँ इधर उधर भागती पर जगह
कम होने के कारण वे जल्द ही एक
जगह स्थिर हो जातीं ,और जब ये मछलियाँ
बाजार पहुँचती तो भले वे ही सांस ले रही
होतीं लकिन उनमेँ वो बात नहीं होती जो
आज़ाद घूम रही ताज़ी मछलियों मे होती ,
ओर जापानी चखकर इन मछलियों में भी
अंतर कर लेते ।

तो इतना कुछ करने के बाद भी समस्या
जस की तस बनी हुई थी।अब मछुवारे
क्या करते ? वे कौन सा उपाय लगाते कि
ताज़ी मछलियाँ लोगोँ तक पहुँच पाती ?नहीं,
उन्होंने कुछ नया नहीं किया , वें अभी भी
मछलियाँ टैंक्स में ही रखते , पर इस बार
वो हर एक टैंक मे एक छोटी सी शार्क
मछली भी ङाल देते।

शार्क कुछ मछलियों को जरूर खा जाती
पर ज्यादातर मछलियाँ बिलकुल ताज़ी
पहुंचती।ऐसा क्यों होता ? क्योंकि शार्क
बाकी मछलियों की लिए एक चैलेंज की
तरह थी। उसकी मौज़ूदगी बाक़ी मछलियों
को हमेशा चौकन्ना रखती ओर अपनी
जान बचाने के लिए वे हमेशा अलर्ट रहती।

इसीलिए कई दिनों तक टैंक में रह्ने के
बावज़ूद उनमे स्फूर्ति ओर ताजापन बना रहता।

आज बहुत से लोगों की ज़िन्दगी टैंक मे पड़ी उन मछलियो की तरह हो गयी है जिन्हे जगाने की लिए
कोई शार्क मौज़ूद नहीं है। और अगर
दुर्भाग्यवश आपके साथ भी ऐसा ही है
तो आपको भी आपनी ज़िन्दगी में नई चुनोतियों को स्वीकार करने होगा।
आप जिस रूटीन के आदि हों चुकें हैँ
ऊससे कुछ अलग़ करना होगा, आपको
अपना दायरा बढ़ाना होगा और एक
बार फिर ज़िन्दगी में रोमांच और नयापन
लाना होगा।
नहीं तो , बासी मछलियों की तरह आपका
भी मोल कम हों जायेगा और लोग आपसे
मिलने-जुलने की बजाय बचते नजर आएंगे।

और दूसरी तरफ अगर आपकी लाइफ
में चैलेंजेज हैँ , बाधाएं हैँ तो उन्हें कोसते
मत रहिये , कहीं ना कहीं ये आपको तरो ताज़ा बनाये रखती हैँ , इन्हेँ
स्वीकार करिये, इनका सामना करिये
और अपना  तेज बनाये रखिये।👍
आशीष बहल
चुवाड़ी जिला चम्बा।



Tuesday, January 31, 2017

इस सैनिक की बहादुरी के आप भी हो जायेंगे कायल।

इस सैनिक की बहादुरी सुन आप भी कह उठेंगे

"इज़्ज़त दे न अज़मत दे, सूरत दे न सीरत दे
हे खुदा हे बस मुझे वतन की खातिर कुछ करने की हिम्मत दे बस मुझे मरने की हिम्मत दे"



एक ऐसा ही सैनिक था शहीद जगदीश चन्द। जी हां हवलदार जगदीश चन्द बहादुरी और देश के लिए मर मिटने वाली एक ऐसी शख्सियत जिसने दुश्मनों के नाकों चने चववा दिए। हिमाचल प्रदेश के जिला चम्बा के भटियात के जगदीश चन्द ने सेना में 24 साल तक देश की सेवा की।  वैसे तो सेना से रिटायर हो चुके थे 2010 में परन्तु सेना के प्रति अपना समर्पण कुछ ऐसा कि घर बैठना रास नहीं आया और डिफेन्स सिक्योरिटी कोर के रूप में फिर से सेना में सेवा देना शुरू किया और लेह में तैनात हुए परन्तु माँ भारती को कुछ और ही मंजूर था भारत माता जैसे जगदीश चन्द से कुछ और करवाना चाहती थी इसीलिए जगदीश चन्द को पठानकोट बुला लिया 1 जनवरी 2016 को पठानकोट में अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने निकले और डयूटी के पहले दिन ही
2 जनवरी 2016 की वो सुबह जब आतंकवादियों ने अपने नापाक मंसूबो के साथ पठानकोट एयरवेज पर हमला किया और जब वो अंधाधुंध गोलियां चलाते हुए मैस में पँहुचे तो वँहा सामने ढाल बन कर खड़े थे जगदीश चन्द हिम्मत ऐसी की आतंकियों की ak 47 के सामने निहत्थे खड़े हो गए और आतंकी की ही राइफल छीन कर आतंकी को मार गिराया। तभी पीछे से चूहों की भांति खड़े अन्य आतंकियों ने जगदीश चन्द पर फायरिंग कर दी थोड़ी देर गुथमगुथा होने के बाद जगदीश चन्द माँ भारती की गौद ने चिर निद्रा की और चले गए भारत माता का ये बहादुर सपूत वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी बहादुरी की ये गाथा युगों युगों तक अमर रहेगी। भारत सरकार ने उनकी इस बहादुरी के लिए उन्हें शौर्य चक्र दे कर सम्मानित किया। आओ ऐसे असली धरती पुत्रों की कीर्ति को और फैलाये लोग उन्हें युगों युगों तक याद रखे बच्चे उनकी बहादुरी का अनुकरण करें यही ऐसे शहीदों को सच्ची श्रदांजलि होगी । जय हिंद


शहीद जगदीश और अन्य शहीदों को समर्पित मेरी ये रचना।
शहीदों को सलाम
आतंक का देखो कैसा ये कोहराम मचा है,कभी पठानकोट तो कभी उड़ी की साजिश को रचा है।
कई शहिदों ने शहादत का जाम पिया
शहीद जगदीश ने भी ऊँचा भारत का नाम किया,
शहीद हुए देश की खातिर,सीने पर गोली खाई थी,
आओ झुक कर करें सलाम इन्हें क्योंकि भारत माँ की लाज बचाई थी ।
लुट गयी माँ औ की कोख,कंही सिन्दूर ही उजड़ गया
गिली थी हाथो की मेंहदी अभी, कंही बजी अभी शहनाई थी,
शहीदों ने भारत माँ की लाज बचाई थी,
शहीदों ने भारत माँ की लाज बचाई थी।

लेखक परिचय:-
आशीष बहल
चुवाड़ी जिला चम्बा हि प्र
कवि, लेखक, अध्यापक और स्तम्भ लेखन विभिन्न समाचार पत्रों में

Saturday, January 28, 2017

आखिर क्या रहस्य है इस मंदिर में???

चम्बा के साहू में है ये रहस्यमयी चन्द्रशेखर मंदिर

जिला चम्बा मुख्यालय से लगभग 15 km दूर साहू गांव में स्थापित है चन्द्रशेखर के नाम से प्रसिद्ध एक विशाल शिवलिंग। ये चन्द्रशेखर मंदिर अपने आप में कई पौराणिक कथाएं समेटे है। तथा भारत के समृद्ध संस्कृति व आस्था का प्रतीक है ये मंदिर। मंदिर प्राचीन शैली से निर्मित है और लगभग 1100 साल पुराना बताया जाता है।
तांबे से जड़ित शिवलिंग

स्थापना का रहस्य :-

बताते हैं कि बहुत समय पहले साल नदी के समीप एक ऋषि गुफा में रहते थे जो साथ वहती साल नदी में स्नान करने जाते थे परन्तु वो जब भी सुबह वँहा पँहुचते उनसे पहले कोई नदी में स्नान कर जाता था इस बात से ऋषि हैरान हुए और उन्होंने ये जानने के लिए कि आखिर कौन उनसे पहले स्नान करने वाला धर्मात्मा पैदा हो गया वो इसकी खोज में लग गए । भगवान महेश सब जानते थे और मुनि की चिंता को भी समझते थे। अन, जल त्याग कर मुनि इस रहस्य को जानने में लग गए। तभी एक  सुबह ही 3 शिलाएं महेश, चन्द्रशेखर, और चन्द्रगुप्त नदी में स्नान करने उतरती हैं  ऋषि का मन ये देख हर्षित हो उठता है सही समय जान ऋषि उनके समीप जाते हैं जैसे उनके पास पँहुचे तो एक शिला कैलाश पर्वत की तरफ चली जाती है जो आज प्रसिद्ध मणिमहेश के रूप में बिश्वविख्यात है। चन्द्रगुप्त शिला ने उसी नदी में डुबकी लगाई और बहते हुए चम्बा नगरी के पास दुम्भर ऋषि के समीप जंहा दो नदियां साल और रावी मिलती है वंही विश्राम किया। एक दिन चन्द्रगुप्त ने राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और राजा ने चन्द्रगुप्त को लक्ष्मी नारायण मंदिर के पास चन्द्रगुप्त को स्थापित किया। तीसरी शिला चन्द्रशेखर के रूप में वहीँ पर रुक गयी और वंही ठोस बन गयी। जब ऋषि ने उस शिला को उठाने का प्रयास किया तो असफल रहे वह बहुत भारी हो गयी। ऋषि का मन बहुत व्याकुल हुआ की आखिर इतनी तपस्या के बाद भी क्या हासिल हुआ तब ऋषि को भविष्यवाणी हुई कि पास ही एक गांव पंडाह में एक विन्त्रु सती रहती है अगर वो मुझे स्पर्श करेगी तो मैं फल की भांति हल्का हो जाऊंगा और यंहा से हिल पाउँगा और जंहा मुझे स्थापित होना होगा वँहा मैं भारी हो जाऊंगा। ऋषि ने उस सती भक्त को ढूंढा परन्तु सती ने साथ न आने का कारण बताते हुए कहा कि न तो उसके पति घर में हैं बालक अभी सोया है, मखन पिघलने के लिए रखा है और दूध अभी उबलने रखा है मैं इस समय नहीं आ सकती तो ऋषि ने वरदान दिया कि जब तक तू वापिस नहीं आयेगी बालक सोया रहेगा न मखन जलेगा न दूध उबलेगा। तू चिंता न कर और मेरे वरदान को सत्य जान। तब ऋषि अपने साथ उसे लेकर आये सती ने शिला को स्पर्श किया तथा समस्त नगर वासियों सहित शिला को पालकी में डाल कर और वँहा से चलना आरम्भ किया तभी साहू गांव में पँहुचते ही वो शिला शिवलिंग भारी हो गयी और वंही गांव में मंदिर की स्थापना की गयी।
यात्रा के दौरान अपने सहयोगियों के साथ


 शिवलिंग को मेखली की पकड़ में रखा जाता और ये शिवलिंग दिन प्रतिदिन बड़ा होता जाता जितना भाग जमीन के ऊपर है उतना ही जमीन के नीचे बढ़ता जाता। एक दिन भगवान चन्द्रशेखर ने ऋषि को स्वप्न में बताया कि मेरे आसपास और मेखली न लगायी जाये जो मेखली शेष है उसे बाहर मंदिर के आंगन में लगा दिया जाये जो यंहा आने वाले समस्त जन मानुषों के दुखों का संहार करेगी। इस तरह चन्द्रशेखर महाराज वँहा स्थापित हुए। आज भी मणिमहेश के समान ही वँहा मेला लगता है मणिमहेश की यात्रा को तब तक सम्पूर्ण नहीं माना जाता जब तक साहू के मंदिर में माथा न टेका जाये इसलिए बहुत से लोग इस मंदिर में दर्शन को आते हैं। एशिया के सबसे विशाल शिवलिंग में गिना जाता है।

नंदी महाराज की स्थापना :-





जो इस मंदिर के बारे में एक और रोचक तथ्य है वो है यंहा पर स्थापित नंदी की प्रतिमा ये मंदिर के बिलकुल सामने स्थित है। इन नंदी के निर्माण का पहलूँ भी काफी रहस्यमयी है ये नंदी अपने आप उस जगह पर स्थापित हुए हैं। कहते है कि वो असली नंदी है जो रोज लोगो की फसल तबाह कर देते थे तो एक दिन ग्वाले ने उन्हें देख लिया और उन्हें रोकने के लिए पूंछ से पकड़ लिया और बस उसी समय उसी जगह वो नंदी और ग्वाल शिला रूप में परिवर्तित हो गए। आज भी नंदी के पीछे ग्वाल लटका हुआ दिखता है। तथा जो घण्टी नंदी के गले में है वो टन की आवाज देती है। विज्ञान में रूचि रखने वाले काफी लोगों ने इस पर खोज की परन्तु आस्था के आगे सब नतमस्तक है इसका रहस्य कोई जान नहीं पाया। इस प्रकार की नंदी की प्रतिमा अन्य किसी जगह में देखने को नहीं मिलेगी। देखने में सजे धजे नंदी के रूप में दीखते है जो अनायास ही किसी को भी अपनी और आकर्षित कर लें। 
लेखक परिचय:-
आशीष बहल 
चुवाड़ी जिला चम्बा हि प्र
अध्यापक, लेखक,कवि व विभिन्न अखबारों में स्तम्भ लेखन।
E-mail ___ ishunv0287@gmail.com

Tuesday, January 24, 2017

बेटियां अनमोल हैं


                     बेटियाँ अनमोल हैं

क्या सच में घर का श्रृंगार हैं बेटियां,
फिर समाज में क्यों दिखती आज भी लाचार हैं बेटियां
माना कि पापा की लाडली ,माँ की दुलारी हैं बेटियां,
पर सड़क पर आज भी वहशी दरिंदो की शिकार है बेटियां ।
नवरात्रों में देवी और घर की लक्ष्मी है बेटियां,
पर क्यों कोख में आज भी मार दी जाती है बेटियां
कहने को दो घरो की शान है बेटियां, पर सच इतना है कि अपने घर में भी मेहमान है बेटियां ।
खेल, शिक्षा हर जगह कमाती नाम हैं बेटियां,
पर समाज में आज भी गुमनाम है बेटियां
कन्हा ख़ुद के लिए जीती हैं बेटियां , घर समाज को संवार खुद को भूल जाती हैं बेटियां
कुछ पैसो के लिए आज भी बेच दी जाती हैं बेटियां ।
बेटो से आज कंहा कम है बेटियां, हर जगह नित नया आगाज़ है बेटियां
पर आज भी दहेज़ के लिये जला दी जाती हैं बेटियां
खुद को भूल दूसरों के लिए जीती है बेटियां,
माँ, बहन, और पत्नी कई रूपों में फर्ज निभाती हैं बेटियां
पर समाज में आज भी ठुकरा दी जाती हैं बेटियां
खुद ही खुद से जंग लड़ आगे बढ़ रही है बेटियां
मतलब की इस दुनिया में प्यार सीखा रही हैं बेटियां,
दुनिया की इस भीड़ में अकेली ही चल रही है बेटियां,
पोस्टरों, भाषणों में ही बचा रहे हैं बेटियां,
वरना सच यह है कि कोख में मरवा रहे है बेटियां,
खुदगर्ज इस दुनियां में आज भी अस्तित्व की तलाश में भटक रही हैं बेटियां।
✍✍✍आशीष बहल चुवाड़ी जिला चम्बा

Chamba Rumal is so famous embroidery art जानें क्यों प्रसिद्ध है चम्बा रुमाल

चम्बा का पारम्परिक हुनर चम्बा रुमाल
 भूमिका :--
भारत अपना 68 वा गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। ये पल और ये दिन हर भारतवासी के लिए बहुत ही यादगार होता है जब भारत की विविधता में एकता को प्रकट करती कई झांकिया पेश की जाती हैं इस बार 26 जनवरी 2017 को गणतंत्र दिवस की परेड में एक बार फिर हिमाचल वासियों के लिए गौरवमयी क्षण होगा जब 26 जनवरी की झांकी में तीन साल बाद राजपथ पर हिमाचल की पारम्परिक कला और संस्कृति को पेश करती हुई ऐतिहासिक चम्बा रुमाल की झांकी पेश की जायेगी। इस बार प्रदेश भाषा कला एवं संस्कृति विभाग और विवि के विजुअल आर्ट विभाग के प्रोफेसर एवं आर्टिस्ट प्रो. हिम चटर्जी के विषय और मॉडल को केंद्रीय रक्षा मंत्रालय ने स्वीकार किया है।
हर वर्ष 26 जनवरी की परेड में देश के सभी राज्यों से अपनी संस्कृति की झलक दिखाती झांकियों को पेश किया जाता है जिससे देश के अन्य राज्य एक दूसरे की कला और संस्कृति से परिचित होते हैं तथा पुरे विश्व में भारत की विवध संस्कृति को पहचान मिलती है।पिछले तीन साल से हिमाचल की तरफ से पेश किये किसी भी मॉडल को राष्ट्रीय स्तर का न होने के कारण मंजूर नहीं किया गया। 2013 में हिमाचल की तरफ से जनजातीय जिले किन्नौर की शादी की परंपरा को दिखाती झांकी को राजपथ पर दर्शाया गया था। इस बार हिमाचल की तरफ से जिला चम्बा गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर अपनी ऐतिहासिक विरासत,अद्भुत कला और संस्कृति की मिसाल पेश करते हुए चम्बा रुमाल के इतिहास जीवंत करेगा।

इतिहास:--
वैसे तो हिमाचल के पास कला संस्कृति की कोई कमी नहीं है पूरा हिमाचल अपनी समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है। हिमाचल की संस्कृति को हमेशा लोगो के दिलों में वसाए रखने में जिला चम्बा का अपना एक अहम योगदान रहा है। चम्बा रुमाल भी उनमें से एक है। आज जब चम्बा रुमाल को राष्ट्रीय स्तर की झांकी के लिए चुना गया है तो साथ ही इसकी पहचान अंतराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत होगी। जब चम्बा रुमाल के कारण एक बार फिर हिमाचल वासी खुद को गणतंत्र दिवस की परेड में गौरवान्वित महसूस करेंगे तो ऐसे समय में चम्बा रुमाल के गौरवमयी इतिहास को जानना तथा वर्तमान परिपेक्ष्य में चम्बा रुमाल की अलौकिक कला को समझना अत्यंत आवश्यक है। चम्बा रुमाल के बारे में लिखने और पढ़ने के लिए इतना कुछ है कि उसे किसी एक लेख में परिभाषित नहीं किया जा सकता फिर भी मुख्य बातों को लिखने का प्रयास किया है। चम्बा रुमाल की अद्भुत कशीदाकारी काफी प्राचीन है 16 वीं शताब्दी से भी पहले की ये कला चम्बा ही नहीं बल्कि आसपास भी काफी प्रसिद्ध थी शुरू में ये काँगड़ा , नूरपुर, मंडी और जम्मू के वासोहली में पहाड़ी चित्रकला के रूप में काफी प्रसिद्ध थी। पहाड़ी चित्रकला और शिल्पकला का चम्बा रुमाल एक अनूठा मिश्रण है।  ऐसा भी विश्वास है कि 16वीं शताब्दी  'बेबे नानकी' जो कि गुरु नानक देव जी की बहन थी द्वारा गुरु नानक जी को भेंट किया गया रुमाल आज भी होशियार पुर के गुरूद्वारे में संरक्षित किया गया है जिसे कि चम्बा रुमाल की सबसे प्राचीन कृति के रूप में कुछ लोग मानते हैं।
17 वीं सदी में राजा पृथ्वी सिंह ने चम्बा रुमाल की कला को बहुत अधिक संवारा और रुमाल पर "दो रुखा टांका" कला शुरू की। राजा पृथ्वी सिंह ने महिलाओं के लिए शिक्षा के स्थान पर चम्बा रुमाल की कला को सीखना अनिवार्य किया गया तथा हर शुभ कार्य में चम्बा रुमाल भेंट करने की रस्म शुरू की जो आज भी प्रचलित है लोग आज भी विवाह आदि रस्मों में एक दूसरे को चम्बा रुमाल भेंट करते है यही कारण है कि आज भी ये कला लोगो के बीच में जिन्दा है।
18 वीं शताब्दी में चम्बा रुमाल का काम जोरो पर था। बहुत से कारीगर इस कला से जुड़े थे। उस समय के राजा उमेद सिंह ने इस कला को और कारीगरों को संरक्षण दिया तथा चम्बा रुमाल की कला को दूर तक पंहुचाया। लन्दन के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम में रखा गया चम्बा का रुमाल इसके महान इतिहास के दर्शन करवाता है जिसे चम्बा के राजा गोपाल सिंह ने 1883 में ब्रिटिश सरकार के नुमाइंदों को भेंट किया था जिसमे कुरुक्षेत्र युद्ध की कृतियों को उकेरा गया है। 1911 में चम्बा के राजा भूरी सिंह के द्वारा भी इस हुनर को बहुत सम्मान दिया गया दिल्ली दरबार में ब्रिटिश सरकार को चम्बा रुमाल की कई कलाकृतियां भेंट की।



अद्भुत कला और कशीदाकारी :--

            चम्बा रुमाल अपने अद्भुत कला और शानदार कशीदाकारी के कारण निरन्तर प्रसिद्धि की नई इबारत लिखता गया। चम्बा रुमाल की कारीगरी मलमल , सिल्क के तथा कॉटन के कपड़ो पर की जाती है जो कि वर्गाकार तथा आयातकार होते हैं। कई प्रकार की कलाओं को इसमें अंकित किया जाता है जिसमे मुख्यतः श्री कृष्णलीला को बहुत ही सुंदर ढंग से रुमाल के ऊपर दोनों तरफ कढ़ाई करके उकेरा जाता है तथा साथ ही महाभारत युद्ध, गीत गोविन्द से लेकर कई मनमोहक दृश्यों को इसमें बड़ी ही संजीदगी के साथ बनाया जाता है। रुमाल पर खास तरह की कढ़ाई करने की इस कला का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट करवाया गया है। रुमाल पर की गई कढ़ाई ऐसी होती है कि दोनों तरफ एक जैसी कढ़ाई के बेल बूटे बनकर उभरते हैं। यही इस रुमाल की खासियत है।

लोक संस्कृति में स्थान :--

यहां की लोक संस्कृति और गीतों में भी रुमाल की बात सुनने को मिलती है। लोकगीतों में ये लोकगीत
"राम लछमन चोपड़ खेलदे,
सिया रानी कडदी कसीदा"
काफी प्रसिद्ध है जो कि कई खास मौकों पर गाया जाता है।
लोगो के निजी जीवन व पारंम्परिक रीती रिवाजो में भी चम्बा रुमाल को अहम स्थान दिया जाता है चम्बा के लोग विवाह शादी के समय दूल्हे दुल्हन को शगुन स्वरूप चम्बा रुमाल भेंट करते हैं। पुराने समय में राजपरिवारों में भी चम्बा रुमाल को भेंट स्वरूप दिया जाता था यही कारण है कि चम्बा की पारम्परिक कला आज भी लोगो में उतनी अधिक प्रसिद्ध है।

विभिन्न व्यक्तित्व और सम्मान:---

चम्बा रुमाल को पहचान दिलाने के लिए बहुत से लोगो को हमेशा याद किया जाता है 1965 में चम्बा रुमाल के लिए पहला राष्ट्रीय पुरस्कार श्री मति माहेश्वरी जी को दिया गया इसके बाद कई लोगो को ये पुरस्कार मिले तथा इस प्राचीन कला को जीवंत रखा जिसमें मुख्य नाम पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित विजय शर्मा जी, सोहन लाल, कमला नैयर, सराज बेगम, अमी चन्द, चिमि देवी, आनंद प्रकाश आदि का है।
इसमें बहुत बड़ा और अहम  योगदान श्री मति ललिता वकील जी का है जिन्हें 1993 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया तथा 2012 में राष्ट्रपति द्वारा शिल्प गुरु सम्मान से सम्मानित किया गया ये सम्मान पाने वाली ये इकलौती हिमचली हस्तशिल्पी हैं। श्री मति ललिता जी ने चम्बा रुमाल की हस्तकला को जीवित रखने तथा अन्य लोगो तक इसे पँहुचांने में विशेष योगदान दिया है। उन्होंने बहुत से लोगो को इस कला को सिखाया तथा दूर दूर तक चम्बा रुमाल की पहचान कराई तथा इस महान कला को संवारा सजाया और यही कारण है कि आज चम्बा रुमाल राजपथ पर अपनी चमक बिखेरने को तैयार है। इस  झांकी में चंबा चौगान, लोक गीत के साथ पांच साल पूर्व में मनाए गए एक हजार वर्ष के उपलक्ष्य में बनाए गेट को भी दिखाया जाएगा।

रोजगार में अवसर :---

आज बहुत से लोग इस खासकर महिलाएं इस कला को संजोने और सहजने में लगी हुई है। सरकार को चाहिए कि इस पुरानी कला को रोजगार क्षेत्र से जोड़े। आज चम्बा रुमाल की मांग और लोगो के बीच में पसन्द इस कदर बढ़ रही है कि चम्बा रुमाल 5 हजार से 50 हजार की कीमत तक बिकते है यदि हिमाचल सरकार द्वारा स्कूलों में वोकेशनल शिक्षा में चम्बा रुमाल के विषय को जोड़ा जाए तो ये अपने आप में एक बहुत ही बेहतर कदम होगा। इससे आने वाली पीढ़ी तक ये कला हस्तांतरित होगी और अद्भुत सांस्कृतिक विरासत को दीर्घकाल तक बचाया जा सकेगा। अतः हम सब मिलकर इस कला के प्रति अपना सम्मान दे और गणतंत्र दिवस की परेड में मिलकर अद्भुत पारम्परिक कला का स्वागत करें।

आशीष बहल चुवाड़ी जिला चम्बा
जे बी टी अध्यापक
लेखक और कवि
Ph 9736296410
Email.  ishunv0287@gmail.com

Saturday, January 21, 2017

चम्बा रुमाल का गौरवमयी इतिहास

गणतंत्र दिवस पर चमक बिखेरेगा चम्बा रुमाल

भूमिका :--

भारत अपना 68 वा गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। ये पल और ये दिन हर भारतवासी के लिए बहुत ही यादगार होता है जब भारत की विविधता में एकता को प्रकट करती कई झांकिया पेश की जाती हैं इस बार 26 जनवरी 2017 को गणतंत्र दिवस की परेड में एक बार फिर हिमाचल वासियों के लिए गौरवमयी क्षण होगा जब 26 जनवरी की झांकी में तीन साल बाद राजपथ पर हिमाचल की पारम्परिक कला और संस्कृति को पेश करती हुई ऐतिहासिक चम्बा रुमाल की झांकी पेश की जायेगी। इस बार प्रदेश भाषा कला एवं संस्कृति विभाग और विवि के विजुअल आर्ट विभाग के प्रोफेसर एवं आर्टिस्ट प्रो. हिम चटर्जी के विषय और मॉडल को केंद्रीय रक्षा मंत्रालय ने स्वीकार किया है।
हर वर्ष 26 जनवरी की परेड में देश के सभी राज्यों से अपनी संस्कृति की झलक दिखाती झांकियों को पेश किया जाता है जिससे देश के अन्य राज्य एक दूसरे की कला और संस्कृति से परिचित होते हैं तथा पुरे विश्व में भारत की विवध संस्कृति को पहचान मिलती है।पिछले तीन साल से हिमाचल की तरफ से पेश किये किसी भी मॉडल को राष्ट्रीय स्तर का न होने के कारण मंजूर नहीं किया गया। 2013 में हिमाचल की तरफ से जनजातीय जिले किन्नौर की शादी की परंपरा को दिखाती झांकी को राजपथ पर दर्शाया गया था। इस बार हिमाचल की तरफ से जिला चम्बा गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर अपनी ऐतिहासिक विरासत,अद्भुत कला और संस्कृति की मिसाल पेश करते हुए चम्बा रुमाल के इतिहास जीवंत करेगा।




इतिहास:--

वैसे तो हिमाचल के पास कला संस्कृति की कोई कमी नहीं है पूरा हिमाचल अपनी समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है। हिमाचल की संस्कृति को हमेशा लोगो के दिलों में वसाए रखने में जिला चम्बा का अपना एक अहम योगदान रहा है। चम्बा रुमाल भी उनमें से एक है। आज जब चम्बा रुमाल को राष्ट्रीय स्तर की झांकी के लिए चुना गया है तो साथ ही इसकी पहचान अंतराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत होगी। जब चम्बा रुमाल के कारण एक बार फिर हिमाचल वासी खुद को गणतंत्र दिवस की परेड में गौरवान्वित महसूस करेंगे तो ऐसे समय में चम्बा रुमाल के गौरवमयी इतिहास को जानना तथा वर्तमान परिपेक्ष्य में चम्बा रुमाल की अलौकिक कला को समझना अत्यंत आवश्यक है। चम्बा रुमाल के बारे में लिखने और पढ़ने के लिए इतना कुछ है कि उसे किसी एक लेख में परिभाषित नहीं किया जा सकता फिर भी मुख्य बातों को लिखने का प्रयास किया है। चम्बा रुमाल की अद्भुत कशीदाकारी काफी प्राचीन है 16 वीं शताब्दी से भी पहले की ये कला चम्बा ही नहीं बल्कि आसपास भी काफी प्रसिद्ध थी शुरू में ये काँगड़ा , नूरपुर, मंडी और जम्मू के वासोहली में पहाड़ी चित्रकला के रूप में काफी प्रसिद्ध थी। पहाड़ी चित्रकला और शिल्पकला का चम्बा रुमाल एक अनूठा मिश्रण है।  ऐसा भी विश्वास है कि 16वीं शताब्दी  'बेबे नानकी' जो कि गुरु नानक देव जी की बहन थी द्वारा गुरु नानक जी को भेंट किया गया रुमाल आज भी होशियार पुर के गुरूद्वारे में संरक्षित किया गया है जिसे कि चम्बा रुमाल की सबसे प्राचीन कृति के रूप में कुछ लोग मानते हैं।
17 वीं सदी में राजा पृथ्वी सिंह ने चम्बा रुमाल की कला को बहुत अधिक संवारा और रुमाल पर "दो रुखा टांका" कला शुरू की। राजा पृथ्वी सिंह ने महिलाओं के लिए शिक्षा के स्थान पर चम्बा रुमाल की कला को सीखना अनिवार्य किया गया तथा हर शुभ कार्य में चम्बा रुमाल भेंट करने की रस्म शुरू की जो आज भी प्रचलित है लोग आज भी विवाह आदि रस्मों में एक दूसरे को चम्बा रुमाल भेंट करते है यही कारण है कि आज भी ये कला लोगो के बीच में जिन्दा है।
18 वीं शताब्दी में चम्बा रुमाल का काम जोरो पर था। बहुत से कारीगर इस कला से जुड़े थे। उस समय के राजा उमेद सिंह ने इस कला को और कारीगरों को संरक्षण दिया तथा चम्बा रुमाल की कला को दूर तक पंहुचाया। लन्दन के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम में रखा गया चम्बा का रुमाल इसके महान इतिहास के दर्शन करवाता है जिसे चम्बा के राजा गोपाल सिंह ने 1883 में ब्रिटिश सरकार के नुमाइंदों को भेंट किया था जिसमे कुरुक्षेत्र युद्ध की कृतियों को उकेरा गया है। 1911 में चम्बा के राजा भूरी सिंह के द्वारा भी इस हुनर को बहुत सम्मान दिया गया दिल्ली दरबार में ब्रिटिश सरकार को चम्बा रुमाल की कई कलाकृतियां भेंट की।

अद्भुत कला और कशीदाकारी :--

            चम्बा रुमाल अपने अद्भुत कला और शानदार कशीदाकारी के कारण निरन्तर प्रसिद्धि की नई इबारत लिखता गया। चम्बा रुमाल की कारीगरी मलमल , सिल्क के तथा कॉटन के कपड़ो पर की जाती है जो कि वर्गाकार तथा आयातकार होते हैं। कई प्रकार की कलाओं को इसमें अंकित किया जाता है जिसमे मुख्यतः श्री कृष्णलीला को बहुत ही सुंदर ढंग से रुमाल के ऊपर दोनों तरफ कढ़ाई करके उकेरा जाता है तथा साथ ही महाभारत युद्ध, गीत गोविन्द से लेकर कई मनमोहक दृश्यों को इसमें बड़ी ही संजीदगी के साथ बनाया जाता है। रुमाल पर खास तरह की कढ़ाई करने की इस कला का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेटेंट करवाया गया है। रुमाल पर की गई कढ़ाई ऐसी होती है कि दोनों तरफ एक जैसी कढ़ाई के बेल बूटे बनकर उभरते हैं। यही इस रुमाल की खासियत है।

लोक संस्कृति में स्थान :--



यहां की लोक संस्कृति और गीतों में भी रुमाल की बात सुनने को मिलती है। लोकगीतों में ये लोकगीत
"राम लछमन चोपड़ खेलदे,
सिया रानी कडदी कसीदा"
काफी प्रसिद्ध है जो कि कई खास मौकों पर गाया जाता है।
लोगो के निजी जीवन व पारंम्परिक रीती रिवाजो में भी चम्बा रुमाल को अहम स्थान दिया जाता है चम्बा के लोग विवाह शादी के समय दूल्हे दुल्हन को शगुन स्वरूप चम्बा रुमाल भेंट करते हैं। पुराने समय में राजपरिवारों में भी चम्बा रुमाल को भेंट स्वरूप दिया जाता था यही कारण है कि चम्बा की पारम्परिक कला आज भी लोगो में उतनी अधिक प्रसिद्ध है।

विभिन्न व्यक्तित्व और सम्मान:---

चम्बा रुमाल को पहचान दिलाने के लिए बहुत से लोगो को हमेशा याद किया जाता है 1965 में चम्बा रुमाल के लिए पहला राष्ट्रीय पुरस्कार श्री मति माहेश्वरी जी को दिया गया इसके बाद कई लोगो को ये पुरस्कार मिले तथा इस प्राचीन कला को जीवंत रखा जिसमें मुख्य नाम पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित विजय शर्मा जी, सोहन लाल, कमला नैयर, सराज बेगम, अमी चन्द, चिमि देवी, आनंद प्रकाश आदि का है।
इसमें बहुत बड़ा और अहम  योगदान श्री मति ललिता वकील जी का है जिन्हें 1993 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया तथा 2012 में राष्ट्रपति द्वारा शिल्प गुरु सम्मान से सम्मानित किया गया ये सम्मान पाने वाली ये इकलौती हिमचली हस्तशिल्पी हैं। श्री मति ललिता जी ने चम्बा रुमाल की हस्तकला को जीवित रखने तथा अन्य लोगो तक इसे पँहुचांने में विशेष योगदान दिया है। उन्होंने बहुत से लोगो को इस कला को सिखाया तथा दूर दूर तक चम्बा रुमाल की पहचान कराई तथा इस महान कला को संवारा सजाया और यही कारण है कि आज चम्बा रुमाल राजपथ पर अपनी चमक बिखेरने को तैयार है। इस  झांकी में चंबा चौगान, लोक गीत के साथ पांच साल पूर्व में मनाए गए एक हजार वर्ष के उपलक्ष्य में बनाए गेट को भी दिखाया जाएगा।

रोजगार में अवसर :---

आज बहुत से लोग इस खासकर महिलाएं इस कला को संजोने और सहजने में लगी हुई है। सरकार को चाहिए कि इस पुरानी कला को रोजगार क्षेत्र से जोड़े। आज चम्बा रुमाल की मांग और लोगो के बीच में पसन्द इस कदर बढ़ रही है कि चम्बा रुमाल 5 हजार से 50 हजार की कीमत तक बिकते है यदि हिमाचल सरकार द्वारा स्कूलों में वोकेशनल शिक्षा में चम्बा रुमाल के विषय को जोड़ा जाए तो ये अपने आप में एक बहुत ही बेहतर कदम होगा। इससे आने वाली पीढ़ी तक ये कला हस्तांतरित होगी और अद्भुत सांस्कृतिक विरासत को दीर्घकाल तक बचाया जा सकेगा। अतः हम सब मिलकर इस कला के प्रति अपना सम्मान दे और गणतंत्र दिवस की परेड में मिलकर अद्भुत पारम्परिक कला का स्वागत करें।

आशीष बहल चुवाड़ी जिला चम्बा
जे बी टी अध्यापक
लेखक और कवि
Ph 9736296410
Email.  ishunv0287@gmail.com


Thursday, January 5, 2017

जरा याद करो क़ुरबानी

शहीदों की जरा याद करो कुर्बानी  ....

शहीदों की शहादत का कोई मोल नहीं लगा सकता। शहीद होने वाले सैनिक अपना सर्वसव देश पर कुर्बान करके चले जाते हैं। और शहीदों की शहादत कभी बेकार न जाये इसके लिए आवश्यक है कि हम इनकी क़ुरबानी को हमेशा याद रखें। जब जब शहीदों का जिक्र होता है आतंक का काला सांप फन उठा कर आँखों के आगे आ जाता है।
आतंक एक ऐसा जहर जो भारत को अंदर ही अंदर खोखला करने में लगा है परंतु देश के वीर सैनिकों के होते ऐसा संभव नहीं दीखता कि आतंकी अपने मनसूबों  में कामयाब हो सकें। पिछले साल के शुरू में ही पठानकोट में हुए आतंकी हमले के रूप में एक ऐसा जख्म भारत को मिला जिसका दर्द हम पूरा साल महसूस करते रहे। 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस पर पाकिस्तानी आतंकियों ने भारत को धरती को अपने नापाक इरादों से दशहत में डालने का प्रयास किया। आतंकी चूहों की भांति छिप कर 72 घण्टे तक पठानकोट में अपनी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते रहे 2 जनवरी से 5 जनवरी तक चले इस आतंकी हमले में हमारे वीर जवानों ने आतंकियों को मार गिराया। परन्तु जो जख्म उन आतंकियों ने दिए शायद वो भारतवर्ष कभी भूल नहीं पायेगा। देश के 7 वीर जवान शहीद हो गए। भारत ने ऐसे वीरों को खोया जिसकी भरपाई कभी भी नहीं की जा सकती। शहीद हुए जवानों में 2 जवान हिमाचल के थे। जिसमें एक जिला कांगड़ा के शाहपुर से शहीद जवान संजीवन राणा और दूसरे जिला चम्बा के भटियात क्षेत्र के शौर्य चक्र प्राप्त शहीद जगदीश चन्द जिन्होंने बहादुरी के साथ आतंकी का सामना किया तथा उसी की राइफल से आतंकी को मार गिराया और खुद भी वीरगति को प्राप्त हो गए। पिछले साल मुझे भी शहीद जगदीश जी के परिवार से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस समय एक बात समझ आई की देश पर शहीद होना देश के लिए जितने फक्र की बात होती है परिवार के लिए इसे स्वीकार कर पाना उतना ही मुश्किल काम। ऐसे में देशवासियों का भी फर्ज बनता है कि सैनिको को ये एहसास दिलाएं कि सैनिक का कोई एक परिवार नहीं होता पूरा देश सैनिकों का परिवार होता है। शहीद जगदीश ने तो रिटायर होने के बाद फिर से देश सेवा का प्रण ले लिया और 1 जनवरी को घर से निकले और 2 जनवरी को देश के नाम अपनी ज़िंदगी कर दी। ये बहादुरी की और देश सेवा की वो मिसाल थे जिनके बारे में सुनकर हर भारतीय के अंदर देशभक्ति की वो ज्वाला उठती है कि शहीदों को  जय हिंद कहने को हाथ खुद व खुद उठ जाएँ। शहीदों की शहादत को मोल भारत वर्ष कभी चुकता नहीं कर सकता ये वो कर्ज है जिसे हम मात्र शहीदों के परिवार को सही हक़ दिला कर ही चुकता कर सकते हैं। परन्तु दिल उस समय बहुत दुःखी होता है जब ये सुनने को मिलता है कि शहीद के परिवार अपना हक लेने के लिए इधर उधर भटक रहे हैं। शहीदों ने जो देश के लिए किया है उसे करने के जो हिम्मत चाहिए वो सब के पास नहीं हो सकती। पिछले कुछ दिनों से भटियात में शहीद के नाम पर सिहुंता  कॉलेज का नाम रखने के लिए वँहा के युवाओं ने एक मुहीम चलाई है। मेरा मानना है कि यही सबसे बेहतर तरीका है देश के शहीदों को सही सम्मान देने का जब वँहा के स्कूल और कॉलेज का नाम शहीदों के नाम पर रखा जाये। शहीदों के परिवार खुद को गौरवान्वित महसूस करेंगे और आने वाली पीढियां उनकी बहादुरी और देशभक्ति का अनुकरण करेंगी। अतः इस तरह की मांगों को सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए।
शहीद उस दीपक के समान है जिसने खुद को जला कर पूरे भारत को प्रकाशमय किया है। हम जो आज सुख की ज़िंदगी जी रहे हैं निर्भीक होकर अपने घरों में सोए हैं इसका कारण यही है कि सैनिक हिमालय के समान खड़े होकर - 50 ℃ पर भी हमारी रक्षा कर रहे हैं। वो गर्मी-सर्दी को भूल कर देश के प्रखर पहरी बने हैं। सब त्योहारों पर्वो की तिलांजलि दे कर सिर्फ देश सेवा को ही अपना धर्म मान कर दिन रात सरहद पर डटे हैं। जब गर्मी में हम ए सी की ठंडक ढूंढते हैं वो रेगिस्तान की तपती चादर ओढ़ कर देश के दुश्मनों के समक्ष खड़े रहते हैं। ऐसे सैनिकों के लिए बस इतना ही बहुत है कि हम हमेशा दिलों में उन्हें याद रखें उनकी क़ुरबानी को हमेशा याद करें। 
2016 में आतंकी हमलों ने भारत को अंदर से झकझोर कर रख दिया अगर आंकड़ो में बात करें तो 2015 के मुकाबले भारत में आतंकी हमलों में काफी इज़ाफ़ा हुआ देश के 49 जवान 2016 के आतंकी हमलों में शहीद हुए। वर्ष 2016 भारत में कई छोटे बड़े आतंकी हमले हुए जिसकी शुरुआत 2 जनवरी को पठानकोट हमले से हुई जो 3 दिन तक चलता रहा जिसमे भारतीय सेना ने 7 अनमोल जाने खो दी देश के 7 बहादुर सिपाही शहीद हुए और इसके बाद 25 जून 2016 को पम्पोर में हुए आतंकी हमले में 8 जवान शहीद हुए और 22 घायल, 5 अगस्त 2016 को असम में आतंकी हमला हुआ जिसमें असम राइफल के 14 जवान शहीद हुए । 18 सितम्बर 2016 को साल का सबसे बड़ा आतंकी हमला भारत में जम्मू के उड़ी में हुआ जिसमे सेना के 20 बहादुर जवान वीरगति को प्राप्त हुए और 8 जवान घायल हुए। परन्तु इस आतंकी हमले ने भारत के सब्र को तोड़ दिया और देशवासियों के अंदर भी पाकिस्तान की ऐसी हरकतों पर काफी गुस्सा नजर आया। सरकार की भी निद्रा टूटी और एक बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक कर के भारत के स्पेशल कमांडो ने उडी हमले का प्रतिशोध लिया। पाकिस्तान की सीमा में घुस कर भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान में चल रहे आतंकी केम्पो को तहस नहस कर के सैंकड़ो पाकिस्तानी आतंकवादियों को मार गिराया।
अब आखिर प्रश्न उठता है कि हम कब तक अपने देश के जवानों को मरते हुए देखते रहेंगे। आतंक ने ऐसा तांडव मचाया है जिसका अब कोई स्थायी हल ढूंढना आवश्यक है। देश का हर नागरिक अब भारत की सरकार से पूछ रहा है कि क्या हम आज जब विकास की राह पर अग्रसर है डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया और भी कई विकास की बातें हम कर रहे हैं क्या कोई ऐसा प्रबन्ध नहीं किया जा सकता कि देश में इन आतंकियों को घुसने से रोका जा सके। अब समय आ गया है कि भारत और भी कड़े रुख को अपनाए पाकिस्तान को विश्व के सामने नंगा कर के उसे आतंकी देश घोषित कराये। मौजूदा भारत सरकार ने कई बड़े कदम पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए उठाये भी हैं। वर्तमान में नोटबन्दी को भी आतंकी गतिविधियां रोकने में एक मील का पत्थर समझा जा रहा है। आज हम सब देशवासियों को ये संकल्प लेना होगा कि हम देश के शहीदों को हमेशा याद रखेंगे उनके एहसान को हम कभी भुला नहीं सकते। जब जब शहीदों के परिवार को जरूरत हो हम हर दुःख सुख में इनका साथ दें।  ऐसे वीर जवानों के लिए हर भारतवासी को हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए। आओ हम ऐसे सैनिकों का वंदन करते हैं और सबसे कहते हैं कि
आओ झुक कर करें सलाम उनको जिनके हिस्से में ये मुकाम आता है, कितने खुशनसीब हैं वो खून जिनका वतन के काम आता है।
जय हिंद

आशीष बहल 
चुवाड़ी जिला चम्बा 

Wednesday, February 8, 2012

Udasi

Hum apko khone nhi denge, juda hona b chaho to hone nhi denge, chandni rato m ayegi meri yad, meri yado k vo pal tumhe sone nhi denge..
Wo Roye To Bahot Par Mujse Muh Mod K Roye,
Koi Majburi Hogi Jo Dil Tod K Roye,
Mere Samne Kar Diye Meri Tasvir K Tukde,
Pta Laga Mere Piche wo Unhe Jod K roye .